NAVODAYANS HEIGHTS

खबर भी, कैरियर भी


भारत में माध्यमिक शिक्षा की प्रमुख समस्याएं
Dated : 2019-04-30
By -अजीत कुमार,झारखण्ड
शिक्षा का अधिकार क़ानून के मुताबिक 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए पहली से आठवीं तक
मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। इसके बाद बच्चे माध्यमिक शिक्षा की तरफ आगे
बढ़ते हैं। यानि 14 से 18 वर्ष तक के छात्र-छात्राएं माध्यमिक शिक्षा के दायरे में आते हैं।
भारत में माध्यमिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (RMSA)
का गठन किया है। जो विभिन्न राज्यों में माध्यमिक शिक्षा को दिशा देने व वित्तीय संसाधन
जुटाने में मदद करता है। जैसे उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा अभियान (UPMSA)
काम कर रहा है।
माध्यमिक शिक्षा का जिक्र आते ही बोर्ड परीक्षाओं का जिक्र हो आता है। इसके बाद नकल की
कहानियां भी याद आ जाती है। बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम जारी होने के समय छात्र-छात्राओं के
तनाव की खबरें भी हम अक्सर पढ़ते-सुनते हैं। दरअसल माध्यमिक स्तर की शिक्षा कॉलेज की
तैयारी का इंट्री प्वाइंट होती है। यहां से बच्चे भविष्य मं करियर के चुनाव को ध्यान में रखते
हुए विषयों का चुनाव करते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी करते हैं। 12वीं पास
करते-करते छात्र सरकारी नौकरी में आवेदन करने योग्य भी हो जाते हैं। वे इसके लिए जरूरी
शैक्षिक योग्यता भी हासिल कर लेते हैं। इस नज़रिए से 12वीं तक की पढ़ाई का महत्व बहुत
ज्यादा बढ़ जाता है।
भारत में माध्यमिक शिक्षा की प्रमुख चुनौतियां :-
1. छात्र-शिक्षक अनुपात का संतुलित न होना। बहुत से स्कूल ऐसे हैं जहाँ छात्रों के अनुपात में
शिक्षक नहीं हैं। इस कारण से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। बच्चों को गुणवत्तापूर्ण
शिक्षा नहीं मिल पाती और पढ़ाई के मामले में बाकी क्षेत्रों के बच्चों से पीछे रह जाते हैं।
2. विषयवार शिक्षकों का अभाव। भारत में बहुत से सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहाँ पर विभिन्न
विषयों के शिक्षक नहीं हैं, इसके कारण भी बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है।

3. पुस्तकालय की दयनीय स्थिति। विभिन्न राज्यों के बहुतायत स्कूलों में माध्यमिक स्तर पर
बच्चों में पढ़ने की आदत का विकास करने पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। इसका
एक उदाहरण लायब्रेरी की उपेक्षा के रूप में नजर आता है। या तो स्कूल में ढंग की किताबें
नहीं होती हैं। अगर किताबें होती भी हैं तो वे ताले में बंद रहती हैं।
4. परीक्षाओं का दबाव। भारत में बोर्ड परीक्षाओं के डर की कहानी से आप सभी परिचित हैं।
परीक्षाओं के दौरान किसी भी तरीके से पास होने वाली प्रवृत्ति नकल को बढ़ावा देती है। बोर्ड
परीक्षाओं के दौरान बच्चों के ऊपर अच्छे प्रदर्शन का काफी दबाव होता है। यह दबाव शिक्षा
के प्रति उनकी स्वाभाविक रूचि को परिष्कृत करने की बजाय उससे अरुचि पैदा करती है।
5. पासबुक पर निर्भरता। माध्यमिक स्तर पर आते-आते बहुत से छात्रों को पासबुक की आदत
लग जाती है। क्योंकि परीक्षाओं में रटकर सवालों के जवाब देने की क्षमता का ही परीक्षण
होता है। ऐसे में पासबुक के ऊपर बच्चों की निर्भरता बढ़ जाती है। इसके कारण उनमें कक्षा
के अनुरूप पठन व लेखन कौशल का विकास नहीं हो पाता। वे किसी सवाल के बारे में
सोचकर उसके जवाब तलाशन की प्रक्रिया से गुजरे बगैर सीधे जवाब तक पहुंचने की आदत
के अभ्यस्त हो जाते हैं। पासबुक उद्योग का करोड़ों का कारोबार इसका जीवंत उदाहरण है।
वन-वीक सीरीज़ जैसी चीज़ें भी माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही हैं।
6. प्रयोगशाल की खराब स्थिति। बहुत से स्कूलों में साइंस वर्ग की पढ़ाई तो शुरू हो गई है।
मगर वहाँ प्रयोगशाला का अभाव है। इसके कारण बच्चों को विज्ञान के व्यावहारिक पहलू की
जानकारी नहीं हो पाती है। प्रेक्टिकल के नंबर का दबाव बच्चों के ऊपर होता है। इस कारण
से वे कालांश के दौरान खुलकर सवाल नहीं पूछ पाते। बहुत से स्कूलों में शिक्षकों के दबाव
के कारण वे कोचिंग क्लासेज़ में भी पढ़ने को बाध्य होते हैं।
7. कोचिंग सेंटर पर बढ़ती निर्भरता। 10वीं व 12वीं के दौरान ही विद्यार्थियों के विभिन्न
प्रतियोगी परीक्षाओं में बैैठने की शुरूआत हो जाती है। इसका दबाव अभिभावकों के ऊपर
होता है। वे चाहते हैं कि बच्चों को परीक्षा में अच्छे नंबर आएं ताकि अच्छे कॉलेज में
दाखिला मिल सके। अच्छी तैयारी हो ताकि प्रवेश परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन कर सकें। इस
कारण से भी कोचिंग सेंटर पर छात्रों की निर्भरता तेज़ी से बढ़ी है। इस समस्या से ग्रामीण
और शहरी दोनों क्षेत्रों में मौजूद विद्यालय जूझ रहे हैं।
8. अनुपयुक्त पाठ्यक्रम। माध्यमिक स्तर का पाठ्यक्रम किताबी ज्ञान को समझ से ज्यादा
तवज्जो देता है। इसके कारण बच्चों का पढ़ाई के प्रति सही रुझान नहीं बन पाता है। वे
विभिन्न विषयों को बग़ैर इस समझ के पढ़ रहे होते हैं कि वे उसका इस्तेमाल कहां करेंगे।
ऐसे में पाठ्यक्रमों को ज्यादा व्यावहारिक बनाने की जरूरत भी है।

9. दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली। दो साल की पढ़ाई का मूल्यांकन पहले एक ही साल में हो जाता था।
मगर बाद में 10वीं व 12वीं के पाठ्यक्रम को अलग-अलग किया गया। ताकि बच्चों पर से
पढ़ाई का बोझ कम किया जा सके। साल भर में एक बार होने वाली परीक्षा से मूल्यांकन
कि सिलसिला ज्यों का त्यों जारी है। इसमें कोई ख़ास बदलाव नहीं हुआ है। इसमें बच्चों के
लेखन कौशल वाली अभिव्यक्ति का मूल्यांकन तो हो रहा है। मगर अन्य कौशलों का
मूल्यांकन नहीं हो पा रहा है।
10. कॉलेज की तैयारी के  लिए कितनी उपयोगी? माध्यमिक शिक्षा विश्वविद्यालय में
दाखिले का इंट्री प्वाइंट हैं। यहीं से छात्रों के कॉलेज जाने की शुरूआत होती है। जहां वे
ज्यादा विस्तृत दुनिया के साथ आपसी संवाद और सीखने-सिखाने का मौका हासिल करते हैं।
माध्यमिक शिक्षा को कॉलेज की तैयारी की दृष्टि से ज्यादा उपयोगी बनाने की जरूरत है
ताकि बच्चों में विश्लेषण की क्षमता का विकास हो सके और वे किसी सवाल को अपने
परिवेश से जोड़कर उसका जवाब दे सकें।

PREVIOUS EDITIONS

ISSUE ON : JANUARY 2019

ISSUE ON : DECEMBER 2018

ISSUE ON : NOVEMBER 2018

ISSUE ON : OCTOBER 2018

ISSUE ON : SEPTEMBER 2018

Editor's Picked

LATEST STORY

FEATURED STORY

You May Have Missed

FOLLOW US ON

© Copyright 2019 Navodayans Heights | Registred News Magazine Titile Code : UPBIL05007 | Developer : ABHISHEK KUMAR - All rights reserved.